ग़ज़ल - वास्ता

व़ज़्न -  1222 1222 1222 1222

न दरबारी वजीरों से न ही छोटे सिपाही से ।
फकीरों के जुड़े है तार सीधे बादशाही से ।।

बहा के अश्क़ हमदर्दी जता देना दिखावा है ,
असल मतलब है' इनको सिर्फ अपनी वाहवाही से।।

खुदा की रहमतों वाली अदालत है बड़ी सबसे ,
जहाँ पर फैसले होते नहीं झूठी गवाही से ।।

अगर यूँ ही चली हर बार मनमर्जी तुम्हारी ही ,
पड़ेगा फर्क क्या बोलो मिरी हामी मनाही से ।।

चलें जो तान के सीना सरापा तन सफेदी में ,
सियासतदार वे सब खौफ खाते है सियाही से ।।

अभी के शोर से दुगुनी फकत खामोशियाँ होंगी ,
नया आगाज जब होगा कयामत की तबाही से ।।

बिना दीदार के जो इश्क़ को बेरंग कहते हैं ,
वे' शायद वास्ता रखते नहीं इश्क़ेइलाही से ।।

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आशीष हरीराम नेमा
©aashish_hr_nema